ग्वालियर/भोपाल
मध्य प्रदेश की सियासत में आज पारा किसी चुनावी मौसम की तरह चढ़ा हुआ है। केंद्र में कृषि की कमान संभाल रहे ‘पांव-पांव वाले भैया’ यानी शिवराज सिंह चौहान ने जब से भारत-अमेरिका ट्रेड डील की वकालत करते हुए विपक्ष पर प्रहार किया है, भोपाल के गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
सियासी बिसात पर ‘ट्रेड डील’ की चाल इस पूरी खबर का लब्बोलुआब यह है कि क्या यह समझौता मध्य प्रदेश के उन लाखों किसानों के लिए ‘वरदान’ है जो सोयाबीन और गेहूं के भरोसे अपनी जीविका चलाते हैं, या फिर यह विदेशी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोलने का ‘आत्मघाती’ द्वार है?
• शिवराज का ‘आक्रामक’ बचाव: शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट रूप से इसे “किसानों की समृद्धि का नया अध्याय” करार दिया है। उनका तर्क है कि भारतीय कृषि अब वैश्विक बाजारों की मांग पूरी करने के लिए पूरी तरह तैयार और सक्षम है।
• विपक्ष की ‘घेराबंदी’: दूसरी तरफ, जीतू पटवारी और उमंग सिंघार इस डील को किसानों के लिए ‘डेथ वारंट’ की तरह पेश कर रहे हैं। कांग्रेस का आरोप है कि अमेरिकी डेयरी उत्पादों और सब्सिडी वाले विदेशी अनाजों के आने से मध्य प्रदेश का स्थानीय बाजार पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा।
मध्य प्रदेश के लिए इसके मायने क्या हैं? राजनीतिक चश्मे से देखें तो यह खबर केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनावों की शुरुआती ‘पिच’ तैयार करने जैसा है।
1. क्रेडिबिलिटी की जंग: शिवराज सिंह चौहान की छवि हमेशा से ‘किसान पुत्र’ की रही है। अगर यह डील धरातल पर किसानों को परेशान करती है, तो उनकी दशकों की जमा की हुई राजनीतिक पूंजी पर आंच आ सकती है।
2. कांग्रेस के पास ‘संजीवनी’: लंबे समय से सत्ता के वनवास को झेल रही कांग्रेस को इस मुद्दे में एक ऐसी “संजीवनी” दिख रही है, जिससे वह ग्रामीण वोट बैंक में फिर से सेंध लगा सके।
नजरिया: असल मुद्दा यह नहीं है कि कौन चिल्ला रहा है, बल्कि बुनियादी सवाल यह है कि क्या इस डील की बारीकियों में मध्य प्रदेश के सोयाबीन बेल्ट के किसानों के लिए पर्याप्त सुरक्षा कवच (Safety Nets) दिए गए हैं? अगर सरकार ने आयात शुल्क में बड़ी छूट दी है, तो मालवा और निमाड़ के किसानों का आक्रोश आने वाले समय में सड़कों पर चिंगारी बनकर फूट सकता है।
