संजय द्विवेदी, लखनऊ। त्योहार हो या कोई पारिवारिक खुशी का अवसर, मिठाइयों के बिना उत्सव अधूरा माना जाता है। लेकिन समय के साथ यही मिठाइयाँ स्वाद के बजाय बीमारियों का कारण बनती जा रही हैं। मुनाफे की अंधी दौड़ में मिलावटखोर विक्रेता मिठाइयों में नकली खोया, सिंथेटिक दूध, केमिकल युक्त रंग, सड़े-गले मेवे और अन्य हानिकारक रसायनों का खुलेआम इस्तेमाल कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर जनता की सेहत से खिलवाड़ है।
खासतौर पर त्योहारों के दिनों में मिठाइयों की मांग बढ़ते ही मिलावट का यह अवैध कारोबार और तेज हो जाता है। चमकदार रंगों और आकर्षक सजावट के पीछे छिपा यह ज़हर बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए सबसे अधिक घातक साबित हो रहा है। चिकित्सकों के अनुसार ऐसी मिलावटी मिठाइयों के सेवन से पेट की गंभीर बीमारियाँ, फूड पॉइज़निंग, लीवर और किडनी संबंधी रोग, त्वचा रोग तथा कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि खाद्य सुरक्षा विभाग की निगरानी और समय-समय पर की जाने वाली कार्रवाई के बावजूद कई क्षेत्रों में मिलावटखोर बेखौफ होकर अपना धंधा जारी रखे हुए हैं। सीमित जांच, संसाधनों की कमी और कमजोर कार्रवाई के चलते आम जनता मजबूरी में मिलावटी खाद्य पदार्थों का सेवन करने को विवश है।
जनहित में आवश्यक है कि खाद्य सुरक्षा विभाग त्योहारों के दौरान सघन जांच अभियान चलाए और दोषी पाए जाने वाले विक्रेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे। इसके बावजूद यदि मिलावटखोर सक्रिय हैं, तो इस मामले में आम नागरिकों की जागरूकता भी बेहद जरूरी है। लोगों को अत्यधिक चमकदार और अस्वाभाविक रंगों वाली मिठाइयों से परहेज करना चाहिए, केवल
विश्वसनीय और पंजीकृत दुकानों से ही खरीदारी करनी चाहिए तथा किसी भी प्रकार की मिलावट की आशंका होने पर तुरंत संबंधित विभाग में शिकायत दर्ज करानी चाहिए।
त्योहार खुशियाँ बांटने के लिए होते हैं, बीमारियाँ बांटने के लिए नहीं। इसलिए ज़रूरी है कि मिठास के नाम पर ज़हर परोसे जाने से पहले ही समाज और प्रशासन दोनों पूरी तरह सतर्क और जिम्मेदार बनें।