एनएच डेस्क, लखनऊ।
( संजय द्विवेदी )
केजीएमयू में जिहाद और आतंकवाद की घटना पर विवाद आख़िर समाप्त क्यों नहीं हो रहा?
1- पीड़िता और उसके पिता तीन दिन विभाग में कार्यवाई के लिए टहलते रहे लेकिन कार्रवाई तो छोड़िये आश्वासन भी नहीं मिला।
2- विभागाध्यक्ष ने दो जिहादी फैकल्टी के प्रभाव में लड़की के चरित्र पर प्रश्न खड़ा किया और लड़के को अच्छा बताया। रेसिडेंट से दबाव बनवाकर अपराध छुपाने का आरोप किया।
3- विभाग को सारा विषय पता था लेकिन विभाग ने इतने संगीन आरोप पर कहीं किसी को कोई सूचना नहीं दी।
4- जिस फैकल्टी प्रो वाहिद अली पर नमाज पढ़वाने का आरोप है, न उसे फैकल्टी इंचार्ज से आज़ तक हटाया गया और न ही लैब इंचार्ज के पद से।
5- केजीएमयू वाईस चांसलर के ऑफिस में एक जिहादी की नियुक्ति ओएसडी के पद पर कर दी गई जिसे न केवल ग़लत तरीके से परमानेंट की पेंशन दी गई बल्कि मात्र बारह पास व्यक्ति को बड़ी सैलरी भी दी जा रही है।
6- जब तमाम संगठनों ने विरोध दर्ज कराया तो मध्यस्थता के लिए जिस मध्यस्थ को एक बड़े पदाधिकारी के घर संगठन की तरफ़ से भेजा गया, उस पदाधिकारी के निकृष्ट पति ने उस मध्यस्थ की वॉइस रिकॉर्ड करने का पाप किया और उसे आशा थी कि हर व्यक्ति उसी की तरह विरहीन पशु है और आंदोलन पैसे वसूलने के मकसद से कर रहा है। ऐसे में अब कोई मध्यस्थता करना भी नहीं चाहता।
7- उसी निकृष्ट व्यक्ति ने कुछ और बड़े महत्वपूर्ण लोगों को पैसा ऑफर किया कि यह मामला दब जाये लेकिन यह बात लीक हो गई और मामला और बिगड़ गया।
केजीएमयू प्रशासन ने अब तक क्या किया?
HOD पर कार्यवाई शून्य
मामला खराब करने वाले फैकल्टी पर कार्रवाई शून्य
वाईस चांसलर ऑफिस के ओएसडी पर कार्रवाई शून्य
निकृष्ट व्यक्ति द्वारा मध्यस्थ के साथ किए घात पर शर्म शून्य
हर प्रश्न का एक जवाब
हमने कमेटी बनाई और जाँच एसटीएफ को सौप दी।
एसटीएफ तो अपना काम करेगी लेकिन तुम अपना काम कब करोगे?
जिन्होंने गड़बड़ की उसकी सज़ा विश्वविद्यालय प्रशासन क्यों नहीं दे रहा?
आख़िर विश्वविद्यालय प्रशासन ऐसा क्यों कर रहा है?
1- अहंकार की हम सब मैनेज कर लेंगे।
2- कुछ बहुत बड़े लोगों का हाथ हैं, हमारा कुछ नहीं होगा।
3- मूर्खता कि आज नहीं तो कल मामला दब जाएगा।
4- पैसे की ताक़त को विचार की ताक़त से अधिक मानना।
5- यह मूढ़ता कि हम कोई सही कदम उठायेंगे तो लोग उसे हमारी हार समझेंगे
विश्वविद्यालय को क्या करना चाहिए?
एक लाइन में कहना चाहिए कि कुछ लोगों ने गलती की है और उन पर कार्रवाई कर देना चाहिए।
जिनकी ग़लत नियुक्ति हुई है उन्हें हटाकर ख़ुद को करेक्ट करना चाहिए।
विश्वविद्यालय प्रशासन क्या करेगा?
वह लगातार झूठ बोलता रहेगा और एक ऐसे जाल में फसेगा जहाँ से वापस भी होना चाहे तो नहीं हो पायेगा।
फिर क्या होगा?
इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन को जब लगने लगता है कि अब मामला ठंडा होगा, वह गर्म हो जाता है। इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन के ख़िलाफ़ अगले तीन दिन में विरोध प्रदर्शन शुरू हो सकता है। ये विरोध ऐसा होगा कि शायद इसके आँच में कोई न बचे।