जयपुर | विशेष संवाददाता
राजस्थान में सांस्कृतिक, सामाजिक और बौद्धिक प्रतिभाओं को सम्मानित करने की राजकीय परंपरा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक विसंगति इन दिनों विमर्श का विषय बनी हुई है। राष्ट्रपति सम्मान से अलंकृत शिक्षाविद आचार्य सत्यनारायण पटोदिया ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को पत्र प्रेषित कर राज्य सम्मान समारोहों में समय-प्रबंधन के कारण उत्पन्न हो रही व्यावहारिक असमानता की ओर शासन का ध्यान आकृष्ट किया है। उनका कहना है कि यह विषय केवल औपचारिकता या आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि उन साधकों के स्वाभिमान और मनोबल से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने वर्षों तक समाज और राष्ट्र के निर्माण में निःस्वार्थ योगदान दिया है।
प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर मंत्रिमंडल सचिवालय द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति गहन परीक्षण के बाद प्रदेश की विशिष्ट विभूतियों का चयन करती है, जिसमें सामान्यतः 40 से 50 नाम अंतिम सूची में सम्मिलित होते हैं। किंतु समारोह की सीमित समय-सीमा और प्रशासनिक समय-बजट के कारण केवल 11 चयनित व्यक्तियों को ही मुख्य मंच पर सम्मानित किया जा पाता है। शेष चयनित प्रतिभाओं के नाम आधिकारिक रूप से घोषित होने के बावजूद उन्हें सार्वजनिक सम्मान का अवसर नहीं मिल पाता, जिससे सम्मान की प्रक्रिया अधूरी प्रतीत होती है।
आचार्य पटोदिया ने अपने पत्र में यह स्पष्ट किया है कि जब सरकार स्वयं किसी व्यक्ति के योगदान को राज्य स्तर के सम्मान के योग्य मान लेती है, तो केवल समयाभाव के आधार पर उसे मंचीय सम्मान से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। राज्य सम्मान मात्र एक अलंकरण नहीं, बल्कि वर्षों की साधना, तपस्या और सामाजिक योगदान की राजकीय स्वीकृति है। यदि यह स्वीकृति सार्वजनिक रूप से पूर्ण नहीं हो पाती, तो इसका प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उस क्षेत्र से जुड़े असंख्य कर्मयोगियों के मनोबल पर भी पड़ता है।
प्रशासनिक कठिनाइयों को समझते हुए आचार्य पटोदिया ने एक व्यावहारिक और संतुलित समाधान भी प्रस्तुत किया है। उनका सुझाव है कि यदि 26 जनवरी के मुख्य राजकीय समारोह में समय-सीमा अपरिहार्य है, तो सरकार को 26 जनवरी के उपरांत एक पृथक, गरिमामयी सम्मान समारोह आयोजित कर शेष सभी चयनित प्रतिभाओं को विधिवत सम्मानित करना चाहिए। इससे कलाकारों, किसानों, खिलाड़ियों, समाजसेवियों और शिक्षाविदों सहित प्रत्येक चयनित साधक को वह सम्मान प्राप्त होगा, जिसके वे वास्तविक अधिकारी हैं।
एक परिपक्व और संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था वही मानी जाती है जहाँ नियमों की कठोरता मानवीय मूल्यों और सामाजिक सम्मान के मार्ग में बाधा न बने। आचार्य पटोदिया का यह सुझाव मुख्यमंत्री के समक्ष एक अवसर के रूप में देखा जा रहा है, जिससे राजस्थान में सम्मान की एक अधिक समावेशी और गरिमामयी परंपरा का सूत्रपात हो सकता है। यदि इस दिशा में सकारात्मक पहल होती है, तो यह न केवल प्रदेश की सांस्कृतिक और सामाजिक मर्यादा को सुदृढ़ करेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी राजस्थान को एक अनुकरणीय उदाहरण के रूप में स्थापित करेगी।