इन दिनों एक धारणा तेजी से फैलाई जा रही है कि शंकराचार्य को लेकर उठा विवाद किसी सरकार बनाम संत या किसी पार्टी बनाम धर्माचार्य का मामला है। आमजन के बीच यह बात कही जा रही है कि यह “एक पार्टी की कार्रवाई” है। लेकिन यदि विषय को भावनाओं और राजनीतिक चश्मे से हटाकर देखा जाए, तो सच्चाई इससे कहीं गहरी और गंभीर है।
सनातन परंपरा में शंकराचार्य कोई व्यक्तिगत पहचान नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सनातन समाज की सामूहिक स्वीकृति से जुड़ा पद है। यह पद न किसी दल का है, न किसी सरकार का और न ही किसी एक आश्रम की निजी व्यवस्था। शंकराचार्य वही माना जाता है, जिसे परंपरा स्वीकार करे, संत समाज माने और शास्त्रीय मर्यादाएं मान्यता दें।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब शंकराचार्य की नियुक्ति हुई है, तब वह केवल एक घोषणा नहीं रही, बल्कि व्यापक सहमति का परिणाम रही है। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जैसे उदाहरण बताते हैं कि जब अखाड़े, संत, विद्वान और परंपरा एक मत होते हैं, तब किसी अदालत या प्रशासन को हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पड़ती।
वर्तमान विवाद की जड़ भी यहीं है। गुरु के स्वर्गवास के बाद उत्तराधिकारी घोषित किया जाना आश्रम और शिष्य परंपरा का विषय हो सकता है, लेकिन उसी आधार पर स्वयं को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य घोषित कर देना एक अलग स्तर की बात है। यह अंतर यदि समझा जाता, तो शायद विवाद इतना गहराता नहीं।
यह प्रश्न व्यक्ति विशेष का नहीं है। प्रश्न यह है कि— क्या शंकराचार्य पद को निजी उत्तराधिकार की तरह देखा जा सकता है?
क्या केवल एक पक्ष की घोषणा से सम्पूर्ण सनातन समाज पर निर्णय थोपा जा सकता है?
यहीं पर न्यायालय और प्रशासन का हस्तक्षेप सामने आता है। अदालत ने किसी की आस्था पर नहीं, बल्कि प्रक्रिया और मर्यादा पर सवाल उठाया है। प्रशासन भी उसी न्यायिक स्थिति के अनुरूप कार्य कर रहा है। इसे राजनीतिक टकराव कहना विषय को भटकाने जैसा है।
सनातन परंपरा का बल उसकी सहमति, संतुलन और संयम में रहा है। यदि आज इस पद को एकतरफा घोषणाओं से जोड़ दिया गया, तो कल हर बड़ा मठ अपने उत्तराधिकारी को शंकराचार्य घोषित करने लगेगा। इससे न केवल विवाद बढ़ेंगे, बल्कि परंपरा की जड़ें कमजोर होंगी।
इसलिए यह समय पक्ष लेने का नहीं, परंपरा को समझने और बचाने का है।
शंकराचार्य पद न किसी सरकार से मिलता है, न किसी घोषणा से —
यह पद सभी के स्वीकार से बनता है।
और यही सनातन की सबसे बड़ी ताकत है।