श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध का पीतल पर दुर्लभ शिल्पांकन, समुद्र मंथन प्रसंग साकार

स्वामी अवधेशानंद जी गिरी, जूनापीठाधीश्वर की प्रेरणा से समर्पण से संसार पुस्तक द्वारा श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में वर्णित समुद्र मंथन के दिव्य प्रसंग को पीतल पर उकेरने का महत्वपूर्ण और दुर्लभ कार्य पूर्ण किया गया है।

इस कलात्मक एवं आध्यात्मिक परियोजना में श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध के निम्न प्रमुख अध्यायों को क्रमबद्ध रूप से उकेरा गया है—

अध्याय 5: देवताओं का ब्रह्माजी के पास जाना एवं ब्रह्माकृत भगवान की स्तुति
अध्याय 6: देवताओं एवं दैत्यों द्वारा संयुक्त रूप से समुद्र मंथन का संकल्प
अध्याय 7: समुद्र मंथन का आरंभ एवं भगवान शंकर द्वारा विषपान
अध्याय 8: समुद्र से अमृत का प्राकट्य एवं भगवान का मोहिनी अवतार
अध्याय 9: मोहिनी रूप में भगवान द्वारा अमृत वितरण
अध्याय 10: देवासुर संग्राम
अध्याय 11: देवासुर संग्राम की समाप्ति

इस संपूर्ण प्रसंग को 26 पृष्ठों में संजोया गया है, जिसके लिए कुल 49 PLT फाइलें तैयार की गईं। यह कार्य 1 एवं 2 जनवरी को पूर्ण हुआ, जिसमें 3 कलाकारों ने निरंतर 10 घंटे 8 मिनट का श्रम समर्पित किया।

उल्लेखनीय है कि इस परियोजना का सम्पूर्ण आर्थिक वहन स्वामी अवधेशानंद जी गिरी द्वारा किया गया। यह कृति उत्तरायण पर्व के अवसर पर एकरूपता के साथ समर्पित की जाएगी।

धार्मिक साहित्य, शिल्पकला एवं भारतीय सनातन परंपरा के संगम का यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए एक दुर्लभ सांस्कृतिक धरोहर सिद्ध होगा।

संपादक
एड. लोकेश मंगल

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