हाल ही में ग्वालियर में डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर से जुड़ी एक घटना और उसके बाद हुई कानूनी कार्रवाई ने समाज में बहस को जन्म दिया है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह आवश्यक हो जाता है कि हम भावनाओं के बजाय संविधान, कानून और सामाजिक मर्यादा के आधार पर विषय को समझें।
डॉ. भीमराव आंबेडकर किसी एक वर्ग या विचारधारा के नहीं, बल्कि भारतीय संविधान और सामाजिक न्याय के प्रतीक हैं। उनकी तस्वीर या किसी भी प्रतीक का सार्वजनिक रूप से अपमान करना केवल असहमति नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द को चुनौती देने जैसा कृत्य है। ऐसे मामलों को हल्के में लेना न तो कानून के हित में है और न ही लोकतंत्र के।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उकसावे के बीच का अंतर समझा जाए। लोकतंत्र असहमति से मजबूत होता है, लेकिन अपमान और उत्तेजना से कमजोर। संविधान स्वयं यह स्पष्ट करता है कि सार्वजनिक शांति और सामाजिक समरसता को ठेस पहुँचाने वाली अभिव्यक्ति संरक्षण के दायरे में नहीं आती।
वहीं दूसरी ओर, किसी भी घटना की प्रतिक्रिया भी संविधान और कानून की सीमा में ही होनी चाहिए। अपराध पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन अफवाह, अतिशयोक्ति और सामाजिक विभाजन किसी भी पक्ष के हित में नहीं हैं। अलग-अलग घटनाओं को जोड़कर देखना या अपुष्ट तथ्यों के आधार पर धारणा बनाना समाज को और विभाजित करता है।
लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि
कानून अपना काम करे,
न्याय निष्पक्ष रहे,
और समाज संयम न खोए।