नई दिल्ली। ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था और रोजगार व्यवस्था को नए ढांचे में ढालने की तैयारी करते हुए केंद्र सरकार ने ‘VB-G RAM G’ (विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन – ग्रामीण) योजना का खाका सामने रखा है। सरकार इसे केवल एक कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की बुनियाद के रूप में पेश कर रही है।
इस प्रस्ताव के साथ यह स्पष्ट संकेत दिया गया है कि ग्रामीण रोजगार को अब अस्थायी राहत नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक संरचना का हिस्सा माना जा रहा है।
125 दिन का काम, सीधी गारंटी
योजना के तहत हर ग्रामीण परिवार को वर्ष में 125 दिन के रोजगार की गारंटी देने का प्रावधान रखा गया है। वहीं, वन क्षेत्रों में कार्यरत अनुसूचित जनजाति श्रमिकों को अतिरिक्त 25 दिन का रोजगार देने की व्यवस्था प्रस्तावित है। सरकार का दावा है कि इससे आदिवासी बहुल इलाकों में आजीविका के स्थायित्व को मजबूती मिलेगी।
मनरेगा से आगे जाने की कोशिश
‘VB-G RAM G’ को मनरेगा का विस्तार नहीं, बल्कि उससे आगे का मॉडल बताया जा रहा है। प्रस्तावित ढांचे में—
भुगतान व्यवस्था को साप्ताहिक किया गया है, ताकि मजदूरी में देरी की समस्या खत्म हो।
काम और उपस्थिति की निगरानी के लिए GPS, मोबाइल एप और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल का प्रावधान है, जिससे फर्जी मस्टर रोल और कागज़ी काम पर लगाम लगाई जा सके।
खेती पर असर न पड़े, इसके लिए बुआई और कटाई के मौसम में 60 दिनों तक कार्य स्थगन का प्रावधान रखा गया है।
यानी रोजगार और कृषि के बीच संतुलन बनाने की कोशिश स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
‘नाम’ से आगे ‘काम’ का संदेश
दस्तावेज में योजनाओं के नामकरण और सार्वजनिक प्रतीकों को लेकर भी सरकार की सोच झलकती है। संकेत दिया गया है कि अब व्यक्ति-केंद्रित पहचान की बजाय कर्तव्य और सेवा आधारित दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जा रही है। राजपथ का ‘कर्तव्य पथ’ और रेस कोर्स रोड का ‘लोक कल्याण मार्ग’ बनना इसी सोच के उदाहरण माने जा रहे हैं।
गरीबी के आंकड़े और सरकार का दावा
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण गरीबी दर 2011-12 में 25.7 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में घटकर 4.86 प्रतिशत रह गई है। साथ ही यह भी बताया गया है कि अब तक मनरेगा के तहत 8.53 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। सरकार इन आंकड़ों को अपनी ग्रामीण नीति की सफलता के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
कानूनी बदलाव और व्यापक एजेंडा
रिपोर्ट में 2023 में लागू BNS, BNSS और BSA का भी उल्लेख है, जो औपनिवेशिक कानूनों की जगह लेते हैं। सरकार का तर्क है कि प्रशासनिक और न्यायिक सुधार भी उसी व्यापक एजेंडे का हिस्सा हैं, जिसमें ग्रामीण और सामाजिक ढांचे को नए सिरे से तैयार किया जा रहा है।
दिशा साफ, कसौटी ज़मीनी अमल
‘VB-G RAM G’ योजना ग्रामीण भारत के लिए नीति में बदलाव का संकेत जरूर देती है, लेकिन इसकी वास्तविक परीक्षा क्रियान्वयन, पारदर्शिता और राज्यों के सहयोग में होगी। काग़ज़ पर यह योजना जितनी प्रभावशाली दिखती है, ज़मीन पर उतनी ही असरदार साबित होती है या नहीं—इसका फैसला वक्त करेगा।
फिलहाल इतना तय है कि ग्रामीण रोजगार की बहस अब सिर्फ मजदूरी तक सीमित नहीं रही, बल्कि आर्थिक ढांचे और विकास की राजनीति का केंद्र बन चुकी है।