कलेक्टर साहब के दफ्तर में बसंत आ चुका है।
रिकॉर्ड में दर्ज है,
रिपोर्ट में उल्लिखित है,
और समीक्षा बैठक में “संतोषजनक” बताया गया है।
अब अगर किसी को खेत-खलिहान में नहीं दिख रहा,
तो यह उसकी निजी समस्या है।
कागज कहता है—
फसल अच्छी है।
पर किसान कहता है—
“दाम कौन देगा, ये भी कागज बताएगा क्या?”
मंडी में भाव ऐसे टिके हैं
जैसे किसी बाबू ने फाइल के नीचे दबा दिए हों।
जंगल के बारे में बताया गया है कि—
“नियमानुसार कटाई की गई है।”
कटाई तो हो गई,
पर बसंत भी उसी में कट गया—
यह बात रिपोर्ट में नहीं आ पाई।
जहाँ पलाश फूला करता था,
वहाँ अब लिखा है—
“प्रस्तावित विकास क्षेत्र”।
जिन लोगों के साथ बसंत नाचा करता था,
उन्हें समझा दिया गया है—
“आपका पुनर्वास कर दिया जाएगा।”
कब?
इसका जवाब अगली बैठक में मिलेगा।
कस्बे के बच्चे बसंत को पहचानते हैं—
चित्र बनाकर।
उन्हें सिखाया गया है कि
बसंत खुशियों की ऋतु होती है।
यह पाठ्यक्रम में है,
इसलिए सही है।
घर-आँगन में अब बसंत नहीं उतरता।
उसे बुलाने की प्रक्रिया जटिल है।
समय नहीं,
फुर्सत नहीं,
और परंपरा अब नियमावली में फिट नहीं बैठती।
सच पूछो तो
बसंत आया तो है,
पर दहशत में।
उसे डर है कि
कहीं उसे भी सरकारी जमीन घोषित न कर दिया जाए।
कहीं उस पर भी बोर्ड न लग जाए—
“यहाँ प्रवेश निषेध है”।
इसलिए वह बिना शोर किए आया,
बिना महके,
और बिना टिके चला जाएगा।
बाकी कागज में सब ठीक है।
बसंत आ चुका है।