भोपाल।
मध्य प्रदेश में लगातार सामने आ रहे दूषित पेयजल के मामलों को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने गंभीरता से लेते हुए बड़ा कदम उठाया है। एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच, भोपाल ने प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में पानी के संदूषण की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति के गठन का आदेश दिया है। यह आदेश राज्य में उभरते जन-स्वास्थ्य संकट को देखते हुए पारित किया गया है।
एनजीटी ने स्पष्ट किया है कि दूषित पानी की आपूर्ति केवल पर्यावरणीय चूक नहीं, बल्कि सीधे तौर पर आम नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है। न्यायाधिकरण ने जांच समिति को पानी के स्रोतों, सप्लाई सिस्टम, पाइपलाइन नेटवर्क और शुद्धिकरण प्रक्रिया की गहन समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं।
सूत्रों के अनुसार, यह समिति प्रदेश के उन इलाकों पर विशेष ध्यान देगी जहाँ हाल के दिनों में पेयजल से लोगों के बीमार होने, अस्पताल में भर्ती होने और संक्रमण फैलने की घटनाएँ सामने आई हैं। एनजीटी ने यह भी निर्देशित किया है कि जांच केवल कागजी न रहकर जमीनी सच्चाई और जिम्मेदारी तय करने पर केंद्रित हो।
न्यायाधिकरण ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों को चेताया है कि यदि लापरवाही पाई जाती है तो कड़ी जवाबदेही और दंडात्मक कार्रवाई से पीछे नहीं हटा जाएगा। समिति को निर्धारित समय-सीमा में रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
पर्यावरण और जनस्वास्थ्य से जुड़े जानकारों का मानना है कि एनजीटी का यह हस्तक्षेप प्रदेश की जल प्रबंधन व्यवस्था पर सीधा सवाल है। अब यह जांच तय करेगी कि पेयजल संकट प्रशासनिक विफलता है या व्यवस्था में गहरी खामी का परिणाम।