ग्वालियर।
माधौगंज थाना क्षेत्र के होटल में 14 साल की बच्ची के साथ हुई दरिंदगी ने यह साबित कर दिया है कि ग्वालियर में अब बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं। लेकिन यह घटना सिर्फ एक बानगी भर है। हकीकत यह है कि संस्कारधानी कहे जाने वाले ग्वालियर के गली-मोहल्लों में खुले होटल अब ‘सुविधा’ के नाम पर अपराध के अड्डे बन चुके हैं।
शहर का ‘ओपन सीक्रेट’: बिना आईडी, बस दाम चाहिए ग्वालियर के अधिकतर होटलों में ‘नियम’ नहीं, ‘नोट’ चलते हैं। शहर का हर तीसरा बजट होटल प्रेमी जोड़ों और नाबालिगों को चंद घंटों के लिए कमरे उपलब्ध करा रहा है। न आईडी की मांग, न उम्र की तस्दीक और न ही रजिस्टर में एंट्री। माधौगंज की घटना ने इसी ‘सिस्टम’ की पोल खोली है, जहाँ एक बच्ची दिनदहाड़े होटल में ले जाई गई और होटल स्टाफ ने आँखें मूंद लीं।
10 घंटे का सन्नाटा: क्या ‘सेटिंग’ का हो रहा था इंतजार? सबसे बड़ा सवाल ग्वालियर पुलिस की भूमिका पर है। माधौगंज थाने में पीड़िता और आरोपी के मौजूद होने के बावजूद एफआईआर दर्ज करने में 10 घंटे लग गए। यह देरी पुलिसिया जांच का हिस्सा थी या फिर मामले को रफा-दफा करने के लिए ‘रेट’ तय किया जा रहा था? सूत्र बताते हैं कि शहर के होटलों से पुलिस की यह ‘खामोशी’ मुफ्त में नहीं मिलती। शायद यही वजह है कि जब ऐसे मामले सामने आते हैं, तो पुलिस पहले ‘समझौता’ तलाशती है और जब बात नहीं बनती, तब मजबूरी में कानून की किताब खोलती है।
खाकी पर सवाल: रक्षक या मूकदर्शक? पुलिस सब जानती है। बीट के सिपाहियों से लेकर थानेदारों तक को खबर है कि किस होटल में क्या चल रहा है। फिर भी कार्रवाई के नाम पर सिवाय सन्नाटे के कुछ नहीं मिलता। क्या ग्वालियर पुलिस को किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार है, या फिर होटल माफिया का रसूख कानून पर भारी पड़ रहा है?
माधौगंज कांड एक चेतावनी है—अगर अब भी उन होटलों पर ताले नहीं लटके जो नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, तो यह मान लिया जाएगा कि इस ‘गंदे खेल’ में सिस्टम भी बराबर का हिस्सेदार है।