भोपाल।
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों सिर्फ फैसले नहीं हो रहे, संदेश गढ़े जा रहे हैं। वल्लभ भवन में जहां बजट सत्र की औपचारिक तैयारियाँ चल रही हैं, वहीं सत्ता के शतरंज बोर्ड पर सरकार ने सबसे संवेदनशील और निर्णायक मोहरा—आदिवासी समाज—को आगे कर दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का सरदार सरोवर विस्थापितों की रजिस्ट्री नि:शुल्क करने का फैसला अब महज प्रशासनिक राहत नहीं, बल्कि एक गहरी राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
600 करोड़ की राहत या सियासी निवेश?
करीब 25,600 विस्थापित परिवारों को सीधा लाभ और राज्य पर लगभग 600 करोड़ रुपये का वित्तीय भार—सरकार इसे सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम बता रही है। वहीं राजनीतिक हलकों में यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या यह राशि दरअसल आदिवासी बेल्ट में राजनीतिक भरोसा दोबारा हासिल करने का निवेश है?
यह वही क्षेत्र है जहां हाल के चुनावों में भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था।
सिंघार के प्रभाव क्षेत्र में सीधी दस्तक
धार, बड़वानी और अलीराजपुर—ये जिले सिर्फ भौगोलिक पहचान नहीं रखते, बल्कि कांग्रेस के प्रमुख आदिवासी चेहरे और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की राजनीतिक ताकत का केंद्र माने जाते हैं। ऐसे में मुफ्त रजिस्ट्री का फैसला सीधे उस वोट बैंक तक संदेश पहुंचाता है, जिस पर अब तक कांग्रेस की मजबूत पकड़ रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सत्ता और विपक्ष के बीच आदिवासी नेतृत्व की लड़ाई को और तीखा कर सकता है।
बजट सत्र से पहले बदली बहस की दिशा
16 फरवरी से शुरू हो रहे बजट सत्र में विपक्ष ने बंद स्कूलों, बेरोजगारी और आर्थिक दबाव जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति बनाई थी। लेकिन सत्र से ठीक पहले आया यह फैसला सत्तापक्ष को बहस की दिशा आंकड़ों से भावनात्मक विमर्श की ओर मोड़ने का अवसर देता है।
सरकार अब सदन में खुद को कटघरे में खड़ा करने की बजाय आदिवासी अधिकारों के पैरोकार के रूप में प्रस्तुत कर सकती है।
देरी का सवाल और विपक्ष का हमला
विपक्ष का सवाल सीधा है—जो काम वर्षों पहले हो जाना चाहिए था, वह अब राजनीतिक हलचल के बीच ही क्यों सामने आया? कांग्रेस इसे डैमेज कंट्रोल और चुनावी तैयारी करार दे रही है, जबकि सरकार का दावा है कि यह फैसला विस्थापितों के साथ ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने की दिशा में उठाया गया कदम है।
आगे की राजनीति
फिलहाल डॉ. मोहन यादव ने सियासी बिसात पर अपनी चाल चल दी है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि उमंग सिंघार और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी इस फैसले को सदन और सड़क—दोनों जगह किस तरह चुनौती देते हैं।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मध्य प्रदेश की आने वाली राजनीति में जंगल, जमीन और आदिवासी अधिकार केवल सामाजिक मुद्दे नहीं रहेंगे, बल्कि सत्ता की चाबी बनेंगे।