ग्वालियर।
किला गेट स्थित बालाजी धाम मंदिर, गोलपाड़ा के सेवक जगबीर दास ने धर्माचार्य शंकराचार्य और भगवाधारियों के बीच चल रहे सार्वजनिक वाक्-विवाद पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि अध्यात्म के नाम पर हो रहा यह कटु वाक्-युद्ध सनातन समाज को भीतर से तोड़ रहा है, जिसका सीधा लाभ विधर्मियों को मिल रहा है।
जगबीर दास का कहना है कि यदि समय रहते इस स्थिति को सूझबूझ, विवेक और धर्माचरण से नहीं संभाला गया, तो इसके परिणाम केवल धार्मिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर घातक सिद्ध होंगे। शंकराचार्य और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जुड़े हालिया विवादों को उन्होंने दुर्भाग्यपूर्ण और समाज को भ्रमित करने वाला बताया।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि धर्माचार्यों का कार्य समाज को जोड़ना है, न कि उसे दो धड़ों में बाँटना।
गंगा मैया से बड़ा कौन?
जगबीर दास ने पहला प्रश्न उठाते हुए कहा कि गंगा मैया को विश्व की सबसे पवित्र और अजर-अमर नदी माना गया है। शंकराचार्य पहले भी हुए हैं और आगे भी होंगे, लेकिन गंगा मैया सनातन काल से हैं। ऐसे में क्या कोई धर्माचार्य स्वयं को गंगा मैया के प्रभाव और मर्यादा से ऊपर मान सकता है?
श्रद्धा पैदल होती है या अभिमान की पालकी में?
दूसरे प्रश्न में उन्होंने कहा कि जब श्रद्धालु गंगा मैया की गोद में स्नान करने जाते हैं, तो वह यात्रा नम्रता और श्रद्धा से होनी चाहिए, न कि आडंबर और दिखावे की पालकी में।
उन्होंने इसे ग्लैमर और प्रदर्शन करार देते हुए कहा कि ऐसा दिखावा भोले-भाले श्रद्धालुओं को भ्रमित करता है। सवाल यह भी है कि क्या इस तरह का आडंबर गंगा मैया की गरिमा का अपमान नहीं है?
क्रोध क्या संन्यास का आभूषण है?
तीसरे प्रश्न में जगबीर दास ने तुलसीदास कृत सुंदरकांड का उल्लेख करते हुए कहा—
“काम, क्रोध, मद, लोभ सब नाथ नरक के पंथ।”
उन्होंने पूछा कि जब क्रोध को पाप का मूल कहा गया है, तो क्या किसी संन्यासी या धर्माचार्य को क्रोध में आकर मर्यादा भूलनी चाहिए? क्या अनर्गल भाषा और सार्वजनिक आक्रोश धर्माचार्य की शोभा है?
यह लड़ाई किसके लिए?
चौथे और सबसे गंभीर प्रश्न में उन्होंने कहा कि भगवाधारी धर्माचार्यों का आपस में सार्वजनिक रूप से लड़ना ज्ञान और विवेक के अभाव को दर्शाता है।
यह संघर्ष किसके लिए है—स्वयं के अहंकार के लिए या सनातन समाज के लिए?
यदि हिंदू सनातनी आपस में ही बंट जाएंगे, तो विजय किस पर मिलेगी—धर्मियों पर या विधर्मियों पर?
संत का स्वर शांति का होता है
जगबीर दास ने कहा कि संत का हृदय मक्खन की तरह कोमल होना चाहिए और उसके चेहरे पर सदैव शांति और मुस्कान झलकनी चाहिए। संत का कार्य समाज को दिशा देना है, न कि उसे भ्रम और टकराव में झोंकना।