पीतांबरा पीठ की परंपरागत स्वायत्तता पर सवाल, प्रशासनिक समिति से असमंजस

दतिया।
दतिया की पीतांबरा पीठ, जो केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि सिद्ध साधना की परंपरागत केंद्र के रूप में जानी जाती है, इन दिनों प्रशासनिक निर्णयों के चलते चर्चा में है। जिला प्रशासन द्वारा मंदिर परिसर के लिए गठित की गई समिति को लेकर पीठ से जुड़े साधक और ट्रस्टी असहजता व्यक्त कर रहे हैं।

ट्रस्ट का कहना है कि पीतांबरा पीठ की पहचान सामान्य मंदिरों से अलग है। यहां जप, तप और अनुष्ठान की ऐसी परंपराएं हैं, जिनमें गोपनीयता और एकांत का विशेष महत्व है। ऐसे में प्रशासनिक समिति की मौजूदगी से इन परंपराओं के प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

पीतांबरा पीठ दतिया के प्रबंधक महेश दुबे का कहना है कि यह पीठ केवल दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि साधना की एक विशिष्ट परंपरा का केंद्र है, जहां सदियों से तय मर्यादाओं के अनुसार ही गतिविधियां संचालित होती रही हैं। ट्रस्ट का मत है कि मंदिर की आंतरिक व्यवस्थाओं में बाहरी हस्तक्षेप से उसकी मूल प्रकृति प्रभावित हो सकती है।

प्रशासन इस आशंका से सहमत नहीं है। कलेक्टर स्वप्निल वानखेडे का कहना है कि समिति का गठन ट्रस्ट के अधिकारों में दखल देने के उद्देश्य से नहीं किया गया है। उनके अनुसार मंदिर परिसर में चल रहे निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और श्रद्धालुओं की दर्शन व्यवस्था को सुचारु बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। कलेक्टर ने यह भी संकेत दिए हैं कि मंदिर प्रबंधन के प्रतिनिधियों को समिति में शामिल करने पर सहमति बन सकती है।

कानूनी दृष्टि से देखें तो यह मामला सरल नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता शंभू गोस्वामी का कहना है कि यदि कोई धार्मिक ट्रस्ट स्वायत्त रूप से पंजीकृत है, तो उसमें प्रशासनिक समिति का गठन वैधानिक प्रश्न खड़े करता है और ऐसे निर्णयों को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

गौरतलब है कि पीतांबरा पीठ ट्रस्ट की अध्यक्षता राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की वरिष्ठ नेता वसुंधरा राजे करती हैं। इसी कारण यह प्रशासनिक फैसला राजनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि इस संबंध में न तो ट्रस्ट और न ही प्रशासन की ओर से किसी राजनीतिक मंशा की औपचारिक पुष्टि की गई है।

फिलहाल पीतांबरा पीठ का यह मामला आस्था की परंपरा, प्रशासनिक दायित्व और कानूनी सीमाओं के बीच संतुलन की कसौटी पर खड़ा दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि संवाद से समाधान निकलता है या यह विषय न्यायिक व्याख्या की ओर बढ़ता है।

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