*[विशेष रिपोर्ट: ग्वालियर]*
*ग्वालियर।* एक तरफ विकास की पटरियां बिछाने के लिए रेलवे को एक-एक पेड़ का हिसाब देना पड़ रहा है, तो दूसरी तरफ वन विभाग की अपनी ही जमीन पर भू-माफियाओं का कुल्हाड़ा और अतिक्रमणकारियों के ट्रैक्टर बेखौफ चल रहे हैं। ग्वालियर में चौथी रेल लाइन (बायपास) के सर्वे को वन विभाग ने ‘नो ट्री कटिंग’ की सख्त शर्त के साथ हरी झंडी तो दे दी है, लेकिन विभाग का यह दोहरा चरित्र शहर के प्रबुद्ध वर्ग के गले नहीं उतर रहा। सवाल यह है कि जो सख्ती सरकारी प्रोजेक्ट्स पर दिखाई जा रही है, वही मुस्तैदी वन भूमि पर हो रहे अवैध कब्जों और सिमटते जंगलों को बचाने में क्यों गायब है?
*शर्तों की बेड़ियां: एक टहनी कटी तो अनुमति शून्य*
ग्वालियर-मुरैना के बीच सांक से लेकर सिथौली-संदलपुर के संरक्षित जंगलों में सर्वे के लिए उत्तरमध्य रेलवे को कड़ी परीक्षा से गुजरना होगा। वन संरक्षक ललित भारती ने साफ कर दिया है कि सर्वे के नाम पर केवल झाड़ियां साफ होंगी, पेड़ को हाथ भी लगाया तो परमिशन तत्काल निरस्त कर दी जाएगी।
*विभाग की ‘सप्त-शर्तें’:*
* *नो ट्री कटिंग:* पेड़ काटना तो दूर, बिना वन विभाग की संयुक्त निगरानी के टीम जंगल में घुस भी नहीं पाएगी।
* *भारी वाहन प्रतिबंधित:* सर्वे के लिए कोई भी बड़ा वाहन अंदर नहीं जाएगा।
* *जवाबदेही तय:* यदि एक भी पौधा नष्ट हुआ, तो रेलवे के साथ-साथ संबंधित वन अधिकारी पर भी गाज गिरेगी।
*क्यों जरूरी है यह ‘रेलवे बायपास’?*
ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर जमीन की भारी कमी के कारण चौथी लाइन का निकलना लगभग असंभव था। बिरलानगर के पास बने ‘बॉटलनेक’ को खत्म करने के लिए रेलवे ने शहर के बाहर से बायपास का रास्ता चुना है।
* *लागत:* 7339 करोड़ रुपए का भारी-भरकम बजट।
* *रूट:* धौलपुर-बानमोर से टर्न लेकर बड़ागांव-सिथौली होते हुए यह लाइन मुख्य ट्रैक से मिलेगी।
* *फायदा:* इससे ग्वालियर के बाहरी इलाकों (रायरू, तुरारी, अड़ूपुरा) का शहरी विकास होगा और नए स्टेशन अस्तित्व में आएंगे।
*विभागीय विरोधाभास: नियम सिर्फ सिस्टम के लिए?*
रेलवे को ‘पर्यावरण संरक्षण’ का पाठ पढ़ाने वाला वन विभाग उस समय मौन क्यों हो जाता है जब तिघरा, रायरू, बड़ागांव, शंकरपुर और रमौआ आदि की पहाड़ियों पर रात के अंधेरे में वन भूमि को समतल किया जाता है? रेलवे की 7339 करोड़ रुपए की योजना पर तो ‘पहरा’ कड़ा है, लेकिन जंगलों में हो रहे अवैध निर्माणों पर विभाग की ‘नजर’ धुंधली क्यों है? क्या रेलवे से पेड़ों का हिसाब मांगना विभाग की मजबूरी है या अतिक्रमणकारियों को संरक्षण देना उसकी कमजोरी?