Sanjay Diwedi, Lucknow
भारत का मध्यम वर्ग आज एक ऐसी अनकही त्रासदी से गुजर रहा है, जिसे न तो नीतियों में जगह मिलती है और न ही बहसों में। वह न पूरी तरह गरीब है कि सरकारी सहायताओं का पात्र बन सके और न इतना अमीर कि महंगाई की मार से बेपरवाह रह सके। उसकी जिंदगी अमीरी और गरीबी के बीच की उस संकरी गली में फंसी है, जहां हर कदम संभल-संभल कर रखना पड़ता है।
मध्यम वर्ग के सपने साधारण होते हैं—बच्चों को अच्छी शिक्षा, परिवार के लिए सुरक्षित स्वास्थ्य सुविधाएं और एक सम्मानजनक जीवन। लेकिन हकीकत इन सपनों से कहीं ज्यादा कठोर है। बढ़ती महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की आसमान छूती कीमतें, और समाज में “इज्जत” बनाए रखने का दबाव—इन सबने मिडिल क्लास को भीतर से तोड़ दिया है।
एक सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार की तस्वीर देखें। पिता सरकारी या निजी क्षेत्र में सीमित वेतन पर काम करता है। मां घर संभालती है और बच्चों के भविष्य की चिंता में दिन-रात लगी रहती है। बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना मजबूरी बन चुका है, क्योंकि शिक्षा अब ज्ञान से ज्यादा सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई है। हर महीने 10–15 हजार की स्कूल फीस, ऊपर से कोचिंग, ट्यूशन और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी—यह सब मिलकर शिक्षा को एक सपना नहीं, बल्कि भारी बोझ बना देता है। उच्च शिक्षा में यह बोझ लाखों रुपये तक पहुंच जाता है।
भारत में निजी शिक्षा पर निर्भरता इतनी बढ़ चुकी है कि मध्यम वर्ग की बचत धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। नतीजा यह होता है कि परिवार कर्ज लेने को मजबूर हो जाता है और कई बार बच्चे पढ़ाई पूरी होने से पहले ही कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं।
इसके बाद आती है स्वास्थ्य की बारी। माता-पिता की बीमारी या किसी आकस्मिक मेडिकल इमरजेंसी में पूरा परिवार हिल जाता है। सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी और भीड़, जबकि निजी अस्पतालों में इलाज इतना महंगा कि आम आदमी के बस से बाहर। एक गंभीर बीमारी का इलाज लाखों में पहुंच जाता है।
ऐसी स्थिति में मध्यम वर्ग के सामने दो ही विकल्प बचते हैं—या तो कर्ज लेकर इलाज कराए, या इलाज अधूरा छोड़ दे। कई बार मौत बीमारी से नहीं, बल्कि इलाज का खर्च न उठा पाने से होती है। मिडिल क्लास न तो आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का पूरा लाभ उठा पाता है और न ही महंगे स्वास्थ्य बीमा का खर्च वहन कर पाता है। परिणामस्वरूप सपने चुपचाप दम तोड़ देते हैं।
इन सबके बीच एक और अदृश्य लड़ाई चलती रहती है—नकली सामाजिक प्रतिष्ठा की। पड़ोस में किसी ने नई कार ले ली, तो पीछे न रह जाने का डर। बच्चों को साधारण स्कूल में पढ़ाया तो “लोग क्या कहेंगे”। शादी-ब्याह में दिखावा, त्योहारों में महंगे उपहार—ये सब मध्यम वर्ग को भीतर से खोखला कर रहे हैं।
यह असल प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि एक भ्रम है, जिसे बनाए रखने के लिए EMI पर कार, लोन पर मोबाइल और क्रेडिट कार्ड पर खर्च किया जाता है। इसका नतीजा होता है मानसिक तनाव, अवसाद और पारिवारिक कलह।
आज मध्यम वर्ग “सर्वाइवल मोड” में जी रहा है—जहां सपने पीछे छूट चुके हैं और जीवन सिर्फ किसी तरह चलाने की कोशिश बन गया है। आम आदमी की हसरतें अब सिर्फ जीने की नहीं, बल्कि सम्मान से जीने की हैं। लेकिन महंगी पढ़ाई और दवाई ने इन हसरतों को दम तोड़ने पर मजबूर कर दिया है।
यह सवाल अब टालने का नहीं है—क्या यही भारत की विकास गाथा है, जहां कुछ लोग तरक्की की ऊंचाइयों को छू रहे हैं और करोड़ों मध्यम वर्गीय परिवार सिर्फ जीने की जद्दोजहद में फंसे हुए हैं?