जनसुनवाई की ‘फाइल-फाइल’ दौड़ और दम तोड़ता भरोसा

ग्वालियर |
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में ‘जनसुनवाई’ शब्द अब उम्मीद से ज्यादा औपचारिकता का पर्याय बनता जा रहा है। ग्वालियर जिला मुख्यालय पर हर मंगलवार को लगने वाला जमावड़ा इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि ‘नीचे’ की सरकार सो रही है, इसीलिए जनता ‘ऊपर’ की चौखट खटखटाने को मजबूर है।

1. समस्या का ‘री-साइकिल’ मॉडल

हैरानी की बात यह है कि जनसुनवाई समाधान का केंद्र बनने के बजाय ‘डाकघर’ बन गई है। फरियादी जिस भ्रष्ट या लापरवाह अधिकारी की शिकायत लेकर कलेक्टर के पास आता है, प्रशासन वही फाइल वापस उसी अधिकारी को ‘मार्क’ कर देता है। यह तो वही बात हुई कि चोर को ही अपनी चोरी की जांच का जिम्मा सौंप दिया गया। जब तक यह व्यवस्था नहीं बदलेगी, जनसुनवाई महज एक ‘आवक-जावक केंद्र’ ही बनी रहेगी।

2. डेटा का मायाजाल और गायब ‘ऑडिट’

आंकड़ों की बाजीगरी में प्रशासन माहिर है। हर महीने 300 से ज्यादा शिकायतें आती हैं, लेकिन क्या कभी किसी ने यह पूछा कि उनमें से कितनों का ‘संतुष्टिपूर्ण’ निराकरण हुआ?

* कड़वा सच: आवेदनों का निपटारा कागजों पर तो हो जाता है, लेकिन फरियादी की समस्या जस की तस रहती है।

* सुझाव: जिला प्रशासन को चाहिए कि वह ‘रैंडम वेरिफिकेशन’ (आकस्मिक सत्यापन) की पद्धति अपनाए। किसी निजी एजेंसी या स्वतंत्र टीम से उन 82 लोगों को फोन करवाकर पूछा जाए जिनका आवेदन पिछले मंगलवार को लिया गया था—क्या वे समाधान से खुश हैं?

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3. स्थानीय स्तर पर जवाबदेही का ‘शून्य’ होना

अगर पटवारी, तहसीलदार या ब्लॉक स्तर के अधिकारी अपना काम ईमानदारी से कर रहे होते, तो एक बुजुर्ग महिला या दूर-दराज से आए ग्रामीण को ग्वालियर कलेक्टरेट के चक्कर नहीं काटने पड़ते। जनसुनवाई की भीड़ प्रशासन की सफलता नहीं, बल्कि विफलता का सूचक है।

बदलाव का रोडमैप: जो प्रशासन को करना चाहिए

* दोषी अधिकारियों पर पेनल्टी: अगर एक ही शिकायत तीन बार जनसुनवाई में आती है, तो संबंधित क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारी पर आर्थिक दंड या सेवा पुस्तिका में ‘प्रतिकूल प्रविष्टि’ दर्ज होनी चाहिए।

* पब्लिक डैशबोर्ड: हर शिकायत का स्टेटस ऑनलाइन सार्वजनिक हो, ताकि जनता देख सके कि कौन सा विभाग जनता के काम अटका रहा है।

माननीय जिलाधीश महोदय को अब ‘रीति’ नहीं, ‘नीति’ बदलनी होगी। बीते मंगलवार के 82 आवेदनों को एक केस स्टडी की तरह लिया जाए। यदि इन 82 लोगों को बिना दोबारा आए न्याय मिल गया, तो ग्वालियर पूरे प्रदेश के लिए सुशासन का मॉडल बन सकता है। वरना, यह आयोजन केवल चाय-नाश्ते और सरकारी फोटो सेशन तक ही सीमित रह जाएगा।

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