*गुप्तेश्वर और बरा शंकरपुर: जहाँ कानून का डंडा नहीं, ‘माननीयों’ का रसूख चलता है*
*ग्वालियर।* ग्वालियर की पहाड़ियों पर उगता कंक्रीट का जंगल दरअसल उस ‘नापाक गठजोड़’ की उपज है, जिसने सरकारी तंत्र को घुटनों पर ला दिया है। गुप्तेश्वर में चल रही दिखावे की कार्रवाई और बरा शंकरपुर का रहस्यमयी सन्नाटा, दोनों एक ही हकीकत की गवाही दे रहे हैं—कि यहाँ जमीन पर कब्जा *बदमाश* करते हैं, उन्हें *नेताओं* का अभयदान मिलता है और *पुलिस* मूकदर्शक बनी रहती है।
दहशत का साम्राज्य: आखिर कौन उठाए आवाज?
पहाड़ियों पर अतिक्रमण सिर्फ जमीन की हेराफेरी नहीं है, बल्कि यह बदमाशों और असामाजिक तत्वों का सुरक्षित ठिकाना बन चुका है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इन इलाकों में विरोध करने का सीधा मतलब है—मौत या जानलेवा हमले को आमंत्रण देना।
* *नेताओं की सरपरस्ती:* इन गुर्गों के पीछे क्षेत्रीय रसूखदारों का हाथ है, जो इन्हें ‘वोट बैंक’ की फसल काटने के लिए पालते-पोसते हैं।
* *पुलिस की खामोशी:* जब रक्षक ही रसूखदारों के दबाव में हों, तो वर्दी का खौफ खत्म हो जाता है। पुलिस अक्सर अपराधियों पर नकेल कसने के बजाय ‘समझौते’ की बिचौलिए बन जाती है।
पत्रकारिता की बेबसी: नक्कारखाने में तूती की आवाज
एक गंभीर सवाल उन जागरूक नागरिकों और पत्रकारों पर भी है जो जोखिम उठाकर सच लिखते हैं। विडंबना यह है कि जब भी कोई कलम इस ‘नेक्सस’ (गठजोड़) को उजागर करती है, तो शासन की फाइलें उसे रद्दी की टोकरी के हवाले कर देती हैं।
> “जब नेता, बदमाश और पुलिस एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाएं, तो सच की आवाज दबकर रह जाती है। कार्रवाई केवल वहीं होती है जहाँ किसी बड़े ‘हित’ को नुकसान न पहुँच रहा हो।”
बरा शंकरपुर: वन चौकी के साये में फलते-फूलते अपराधी
बरा शंकरपुर का इलाका सिस्टम की नाकामी का सबसे बड़ा प्रमाण है। वन चौकी के बिल्कुल करीब होने के बावजूद यहाँ सालों से जारी अतिक्रमण यह साबित करता है कि यहाँ *’सिस्टम फेल’* नहीं, बल्कि *’सिस्टम बिका’* हुआ है। अपराधियों को बखूबी पता है कि जब तक राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, प्रशासन उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता।
दिखावा छोड़िए, गिरोह की जड़ पर वार कीजिए
यदि वन विभाग (SDO) और जिला प्रशासन वास्तव में पहाड़ियों को बचाना चाहता है, तो उन्हें गुप्तेश्वर में जेसीबी चलाने से पहले उन सफेदपोश चेहरों को बेनकाब करना होगा जो इन बदमाशों की ढाल बने हुए हैं।
वरना…..*प्रशासनिक फाइलों में ‘कार्रवाई’ के आंकड़े तो दर्ज होते रहेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत में ग्वालियर की पहाड़ियाँ अपराधियों के चंगुल में दम तोड़ती रहेंगी।*
