*भोपाल:*
मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार ने आधी आबादी के पक्ष में एक ऐसा संवेदनशील निर्णय लिया है, जो कानूनी पेचीदगियों के बीच फंसी हजारों महिलाओं के लिए ‘उम्मीद की किरण’ बनकर आया है। राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अब वैवाहिक अलगाव या तलाक का दंश झेल रही बेटियां भी अपने दिवंगत माता-पिता की *फैमिली पेंशन* की उतनी ही हकदार होंगी, जितने परिवार के अन्य सदस्य होते हैं।
मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव पर मुहर लगाकर सरकार ने दशकों पुरानी उस विसंगति को दूर कर दिया है, जिसके कारण कानूनी रूप से अलग हो चुकी बेटियां आर्थिक सहायता के लिए दर-दर भटकने को मजबूर थीं।
*फैसले के पीछे का सामाजिक दर्शन*
आमतौर पर सामाजिक संरचना में तलाक के बाद बेटियां अक्सर वित्तीय रूप से असुरक्षित हो जाती हैं। यदि वे अपने माता-पिता पर निर्भर हैं और इसी बीच माता-पिता का निधन हो जाए, तो पेंशन के नियमों में स्पष्टता न होने के कारण उन्हें खाली हाथ रहना पड़ता था। सरकार का यह कदम **’पेंशन नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच’** है।
*मुख्य बिंदु: क्या बदलेगा इस फैसले से?*
* *आर्थिक स्वावलंबन:* विवाह विच्छेद (Divorce) के बाद पिता के घर लौटी बेटियों को अब गुजारे-भत्ते के लिए केवल कानूनी लड़ाई पर निर्भर नहीं रहना होगा।
* *नियमों में स्पष्टता:* अब तक फैमिली पेंशन के दायरे में ‘विधवा’ या ‘अविवाहित’ बेटियों का जिक्र तो था, लेकिन ‘तलाकशुदा’ श्रेणी को लेकर नियम धुंधले थे। अब इसे वैधानिक दर्जा मिल गया है।
* *सरल प्रक्रिया:* प्रशासनिक स्तर पर नियमावली को संशोधित किया जा रहा है ताकि पात्र महिलाओं को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें।
> “यह फैसला पितृसत्तात्मक नियमों की उस दीवार को गिराता है जो बेटी के घर छोड़ने के बाद उसके अधिकारों को समाप्त मान लेती थी। मध्य प्रदेश सरकार का यह निर्णय अन्य राज्यों के लिए एक नजीर साबित हो सकता है।”