(शशिबिन्दुनारायण मिश्र)
(स्मृतियों के आगोश से)
साहित्यिक आयोजनों में प्रायः अब मर्यादा और नैतिकता जैसी चीजें समाप्त होती जा रही हैं। ख़ासकर आयोजक/आयोजन समिति के लोग अपनी महत्ता का फ़ूहड़ प्रदर्शन करने में ही मशगूल देखे जाते हैं। आगंतुक अतिथियों या रचनाकारों के व्यक्तित्व और कद पर उनका ध्यान भी लगभग नहीं रहता है। किसे मंच पर तमीज से सुना जाना चाहिए और कितना तथा कैसा महत्त्व दिया जाना चाहिए,यह सलीका भी जाता रहा। जबकि पहले यह बात नहीं थी। 1980 की बात है, बगहा, बिहार में कवि सम्मेलन आयोजित किया गया था। सहजता – साधुता और शास्त्रीयता के मूर्तिमान रूप, भोजपुरी के धुरंधर कवि एवं छंदशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् धरीक्षण मिश्र भी मौखिक रूप से आमन्त्रित थे , धरीक्षण मिश्र जी गये, किसी को बिना बताये चुपचाप श्रोता दीर्घा की पिछली कतार में एक पेड़ के पास बैठ गये। आयोजन समिति का ध्यान तत्क्षण धरीक्षण मिश्र पर न जा सका। अनेक प्रबन्धकाव्य- खण्डकाव्य- मुक्तकाव्यों के विलक्षण- प्रख्यात रचनाकार चन्द्रशेखर मिश्र की अध्यक्षता में उक्त कवि-सम्मेलन की शुरुआत की जा चुकी थी। यह सर्वविदित है कि हिन्दी और भोजपुरी अञ्चल में चन्द्रशेखर मिश्र की लोकप्रियता बहुत ही अच्छी थी और वे मंचों के अपने समय के बहुत बड़े कवि थे , अनेक कृतियों के कृतिकार भी । धरीक्षण मिश्र स्वभावत: आचार्य, कवि- विद्वान् थे और वे साधु प्रवृत्ति के साधक आचार्यों, कवियों और विद्वानों के बारे में जानकारी प्राप्त होने पर पचासों मील की पैदल यात्रा कर मिलने जाते थे। सन् 1952 में मेरे प्रपितामह मनीषी रचनाकार पं. गणेशदत्त मिश्र ‘मदनेश’ से उनके घर पर पैदल चलकर मिलने आना इसका प्रमाण है।
धरीक्षण मिश्र को युवा कवियों को सुनने की बहुत उत्कण्ठा रहती थी, कि कैसा लिखा-पढ़ा जा रहा है , साहित्य में कुछ नयापन है या नहीं ? मैं यहाँ पर दोनों श्रेष्ठ कवियों की तुलना करने की कोशिश कदापि नहीं कर रहा, तुलना की भी नहीं जा सकती है। दोनों की अपनी-अपनी अति विशिष्ट छवियाँ हैं , जो उन्हें साहित्य में नमनीय बनाती हैं। धरीक्षण मिश्र जी को चन्द्रशेखर जी अपने लिए हर दृष्टि से वरेण्य मानते थे, उनके प्रति काफी श्रद्धा भाव रखते थे। चन्द्रशेखर मिश्र द्वारा धरीक्षण मिश्र को 1982 में डाक द्वारा भेजे गए पत्र से भी इसकी पुष्टि होती है। धरीक्षण मिश्र से उम्र में चन्द्रशेखर जी करीब 25-26 वर्ष छोटे थे। कवि-सम्मेलन शुरू होने के कुछ ही देर बाद अध्यक्षता कर रहे चन्द्रशेखर जी की नज़र श्रोता दीर्घा की पिछली कतार में बैठे धरीक्षण मिश्र जी पर गयी, चन्द्रशेखर जी तत्काल मंच से उतर गए और धरीक्षण मिश्र के पास गए, साथ ही मंचस्थ चन्द्रशेखर जी की देखी-देखा उस समय के मशहूर कवि, आयोजन समिति के प्रमुख, ‘पुरवैया’ के सम्पादक चम्पारण निवासी पाण्डेय आशुतोष भी मंच से हड़बड़ी में उतर कर चन्द्रशेखर जी के साथ गए। हालाँकि मंचीय कवियों में इस तरह का बड़प्पन और शिष्टाचार की मर्यादा अपेक्षाकृत कम ही देखने को मिलती है, पर चंद्रशेखर जी ने उस वक्त कार्यक्रम में भरपूर मर्यादा दिखायी ।
चन्द्रशेखर मिश्र ने धरीक्षण मिश्र का चरणस्पर्श किया, उनसे मंच पर आने के लिए बहुत आग्रह किया। धरीक्षण मिश्र जी मंच पर नहीं जाना चाह रहे थे, ऊपर कहा जा चुका है कि वे समकालीन और नये कवियों को सुनने के बड़े शौकीन थे । इस पर चंद्रशेखर मिश्र ने कहा कि -“यह नहीं हो सकता है कि आप नीचे श्रोता बन कर बैठे रहें और कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता मैं करूँ, यदि आप नहीं मानेंगे और यदि आप श्रोता दीर्घा में ही नीचे बैठे रहेंगे, तो मैं यहाँ से चला जाऊँगा, काव्य-पाठ भी नहीं करूँगा। कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता आपको ही करनी है, आप जैसे वरिष्ठ कवि और आचार्य की उपस्थिति में मैं अध्यक्षता करूँ , यह अमर्यादा होगी।” धरीक्षण मिश्र ने इसका संकेत “काव्य-दर्पण” में किया है। अब विद्वानों / साहित्यकारों / कवियों में सुनने की ललक कम होती जा रही है। दूसरे को सुनना और पढ़ना लगातार कम होता जा रहा है। अब तो जितनी सुनने की ललक रहती है, उससे हजार गुना सुनाने की ललक और हड़बड़ी रहती है, इसीलिए इस तरह की हड़बड़ी और ललक को कोई सुनना भी पसंद नहीं करता है , क्योंकि इस तरह की ललक वाले कभी-कभी जबरिया सुनाने की भी कोशिश करते हैं, सुनाने का उनका उफान देखते ही बनता है।
छोटे-बड़े आयोजनों में और सोशल मीडिया पर आप सब बखूबी इसका अनुभव कर सकते हैं, एक तरह से उपद्रव जैसी स्थिति है। अब साहित्यिक आयोजनों में अधिसंख्य आमन्त्रित श्रोतागण इसीलिए वक्ताओं / कवियों से मन से नहीं जुड़ पाते हैं, वे सज-धजकर देह दिखाने आते हैं या केवल चाय की चुस्की लेने । सोशल मीडिया पर कई बार तो लोग चेहरा देखकर या बिरादरी के नाम पर या परिचित -परिचिता के कारण संकोचवश वाह-वाह करते हुए या टिप्पणी करते हुए देखे जाते हैं। अजीब-सी पट्टीदारी है।आजकल के अपने को बड़ा कवि / साहित्यकार मानने वाले कुछ कवि दूसरों को या नये रचनाकारों सुनना / पढ़ना और उस पर प्रतिक्रिया देना अधर्म समझते हैं। जबकि नये रचनाकारों में अनेक ऐसे हैं जो फिलहाल आत्ममुग्धता के शिकार नहीं है और अच्छा लिख रहे हैं । केवल कई पुस्तकों के प्रकाशन और उम्र की वरिष्ठता के आधार पर अपने को गुरु की भूमिका में देखने लगना तथा हर सामने वाले से अनुसरण और श्रद्धा की आशा करना पीड़ादायक होता है। यह भी सही है कि अनेक बड़े और स्थापित रचनाकार जिनसे लगभग पूरा हिन्दी साहित्य परिचित है। वे नये लोगों को पढ़ते हैं, मार्गदर्शन सहित उचित प्रतिक्रिया देते हैं। मैं इसका साक्षी हूँ। निश्चित रूप से अच्छा / गम्भीर श्रोता और पाठक होना बड़ा कठिन है , अच्छा श्रोता होने के लिए धैर्य अत्यावश्यक है। धरीक्षण मिश्र की अगाध विद्वता और शास्त्रीयता में उनका बेहतरीन श्रोता होना उनके व्यक्तित्व में चार-चाँद लगाता था। भारतीय मनीषा श्रवणीयता में अपार धैर्य के कारण ही इतनी उत्कर्षता को प्राप्त हो सकी है।
चन्द्रशेखर मिश्र और पाण्डेय आशुतोष जी दोनों ने धरीक्षण मिश्र का हाथ पकड़ा और उन्हें मंच पर ले गये। चन्द्रशेखर मिश्र ने आग्रह पूर्वक धरीक्षण मिश्र से ही कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करायी थी। यह आयोजन समिति को भी बड़ा अच्छा लगा था। यह नैतिकता का चरमोत्कर्ष था। ऐसा करके चन्द्रशेखर मिश्र का कद और भी ऊँचा हुआ था। अब कवियों / साहित्यकारों में वैसा शिष्टाचार और मर्यादा कम ही देखने को मिलती है।
इसी तरह की एक घटना देश के जाने-माने साहित्यकार और कवि डॉ रामदरश मिश्र द्वारा पड़रौना में आयोजित प्रथम बार कवि-सम्मेलन में जाने और प्रख्यात विद्वान्, इतिहासकार एवं पुरातत्त्ववेत्ता प्रोफ़ेसर वी. एस. पाठक (पूर्व कुलपति – दी. द. उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय) से सम्बन्धित बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की है । इसकी चर्चा अगली बार…..।
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