वॉशिंगटन/नई दिल्ली:
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले और उसके तुरंत बाद व्हाइट हाउस से जारी हुए नए कार्यकारी आदेश ने वैश्विक व्यापार जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। इसे महज एक कानूनी टकराव के रूप में देखना जल्दबाजी होगी; दरअसल, यह अंतरराष्ट्रीय बाजार के पुनर्गठन की दिशा में एक बड़ा कदम नजर आता है।
अदालती गतिरोध और नई राह
सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुराने शुल्कों को अवैध ठहराए जाने के चंद घंटों के भीतर 10% का नया ‘ग्लोबल सरचार्ज’ लागू करना यह दर्शाता है कि अमेरिकी प्रशासन अपनी व्यापारिक नीतियों को लेकर कितना अडिग है। 24 फरवरी से लागू होने वाला यह शुल्क भले ही 150 दिनों के लिए हो, लेकिन इसका संदेश दूरगामी है।
भारत के लिए अवसर और चुनौतियाँ
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह घटनाक्रम ‘प्रतीक्षा और निगरानी’ (Wait and Watch) से कहीं अधिक सक्रिय होने का समय है।
* प्रतिस्पर्धी लाभ: जहां कुछ पड़ोसी देशों पर पहले से कहीं अधिक भारी शुल्क का साया था, वहीं भारत के लिए 10% का एक समान स्तर उसे अमेरिकी बाजार में फिर से एक मजबूत दावेदार के रूप में खड़ा कर सकता है।
* द्विपक्षीय संबंधों का महत्व: व्हाइट हाउस का भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को सकारात्मक बनाए रखने का बयान और ‘पीएम मोदी के साथ तालमेल’ का जिक्र, नई दिल्ली के लिए एक कूटनीतिक जीत की तरह है।
व्यापार का नया व्याकरण
अगले पांच महीने (150 दिन) वैश्विक अर्थव्यस्था के लिए ‘ट्रायल पीरियड’ की तरह होंगे। यह समय दुनिया भर के देशों के लिए अमेरिका के साथ अपनी नई व्यापारिक शर्तों को तय करने का है। भारत के लिए चुनौती यह नहीं है कि वह इस 10% के बोझ को कैसे सहे, बल्कि यह है कि वह इस अस्थिरता के बीच खुद को दुनिया के सबसे विश्वसनीय आपूर्ति केंद्र (Supply Hub) के रूप में कैसे स्थापित करे।